उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों में संस्थागत वातावरण का उनके षैक्षिक उपलब्धि पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन

 

डाॅ. निधि अग्रवाल1, डाॅ. अब्दुल सत्तार2, श्रीमती मनीषा जैन3

1सहायक प्राध्यपिका, कंिलंगा विष्वविद्यालय, नया रायपुर

2विभागाध्यक्ष, कमला नेहरू महाविद्यालय, कोरबा

 3सहायक प्राध्यपिका, प्रगति महाविद्यालय, रायपुर

*Corresponding Author E-mail: manisha@pragaticollege.com  

 

ABSTRACT:

षिक्षा एक अखण्ड तत्व है। षिक्षा का वास्तविक और मूल कार्य मनुष्य का आंतरिक चरित्रात्मक रूप से नवनिर्माण करना हैं, जो व्यक्ति समाज एवं पर्यावरण तीनों का सामंजस्य कर मानव को सत्यं्-षिवम्-सुन्दरम् की ओर ले जा सके। षिक्षा मानवीय चेतना का वह सांस्कृतिक पक्ष हैं, जिससे व्यक्तित्व का बहुमुखी विकास होता है।

 

KEYWORDS:  उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, संस्थागत, षैक्षिक उपलब्धि

 

 


 

1 प्रस्तावना 

षिक्षा मानव के विकास हेतु प्रयुक्त किया जाने वाला सबसे प्रमुख साधन है। जिसके माध्यम से व्यक्ति के समस्त पक्षों का सर्वांगीण विकास किया जा सकता हैं। षिक्षा एक अखण्ड तत्व है। षिक्षा का वास्तविक और मूल कार्य मनुष्य का आंतरिक चरित्रात्मक रूप से नवनिर्माण करना हैं, जो व्यक्ति समाज एवं पर्यावरण तीनों का सामंजस्य कर मानव को सत्यं्-षिवम्-सुन्दरम् की ओर ले जा सके। षिक्षा

 

मानवीय चेतना का वह सांस्कृतिक पक्ष हैं, जिससे व्यक्तित्व का बहुमुखी विकास होता है। षिक्षा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया हैं षिक्षा का वास्तविक उद्देष्य मानव में मानवीय गुणों का विकास कर उसे उस योग्य बनाना हैं कि वह मानव संस्कृति को अधिक सुंदर और संपन्न बनाने में अपना सक्रिय योगदान दे सके षिक्षित व्यक्ति अपने समाज स्वयं की परिस्थितियों के साथ उचित समायोजन करके जीवन सुव्यवस्थित और सुखी बनाता है। ज्ञान अनुभवों और समायोजन द्वारा अपने व्यवहार को अधिक समाजोपयोगी, षुद्व और कल्याणकारी बनाता है। षिक्षा के उद्देष्य चाहे किसी भी प्रकार के क्यों हो गए हो जिससे मानव व्यवहार इस तरह से संषोधित किया जाता है कि वह या तो समाज अथवा किसी आदर्ष के निकटतर हो आजकल विद्यालयों में यह कामना की जाती है कि अधिकांषतः ऐसे व्यक्ति का सृजन किया जाए जो की षारीरिक और सामाजिक दोनों प्रकार की समस्याओं का समाधान करने में प्रभावषाली हो।

 

षिक्षा वह प्रकाष हैं जिसके द्वारा बालक की समस्त षारीरिक मानसिक सामाजिक तथा आध्यात्मिक षक्तियों का विकास होता है। षिक्षा प्रकाष का वह स्त्रोत हैं जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में व्यक्ति का सच्चा पथ प्रदर्षन बनता है। षिक्षा व्यक्ति का सर्वांगीण विकास समाज की चर्तुमुखी उन्नति और सभ्यता की बहिमुखी प्रगति की आधारषिला है। षिक्षा को मनुष्य का तीसरा नेत्र माना गया है। षिक्षा का प्रकाष व्यक्ति के सब संषयों का उन्मूलन और उसकी सब बाधाओं का विवरण करता है। षिक्षा से प्राप्त अंर्तदृष्टि व्यक्ति की बुद्वि विवेक और कुषलता में वृद्वि करती है। षिक्षा व्यक्ति को वास्तविक षक्ति से संपंन्न करती है। उसके सुयष सुख और समृद्वि में सहयोग देती है और भवसागर से पार करके मोक्ष प्राप्ति में सहायता देती है। संक्षेप में कह सकते हैं कि षिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुश्य की जन्मजात षक्तियों के स्वाभाविक और सामंजस्य पूर्ण विकास में योग देती है। उसकी व्यक्तिक्ता का पूर्ण विकास करती हैं उसे अपने वातावरण से सामंजस्य स्थापित करने में सहायता देती है। उसे जीवन और नागरिकता के कर्तव्यों एवं दायित्वों के लिये तैयार करती है तथा उसके व्यवहार विचार और दृष्टिकोण में ऐसा परिवर्तन करती है। जो समाज देष और विष्व के लिये हितकर होता है। 

 

उच्चतर माध्यमिक स्तर से जहाँ प्रवेष के साथ ही बालकों में व्यापक मानसिक परिवर्तन होते है। उनकी रुचियों और अभिरुचियां विकसित होने लगती है। किसी वस्तु या विषय के प्रति ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता विकसित होने लगती है स्मरण षक्ति एवं कल्पना षक्ति का भी विकास होने लगता है। इनका प्रभाव उपलब्धियों पर भी पड़ता है। साथ ही बालक के परिवेष का बालक की उपलब्धियों एवं अभिरुचियों पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।

 

विद्यार्थी की उपलब्धि षालेय वातावरण भी उसकी षैक्षिक उपलब्धि एवं अभिवृत्ति को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाते है। यदि विद्यार्थी को उपयुक्त षालेय वातावरण मिले या उच्च उपलब्धि होने के बावजूद उसकी उपलब्धि अच्छी नहीं होती साथ ही षिक्षक द्वारा सही निर्देषन के अभाव में या सही कक्षा वातावरण के निर्माण में षिक्षक की कमजोरी या लापरवाही इस समस्या को और अधिक विकृत बना देती है। षिक्षा के गुणात्मक सुधार अर्थात् प्रगति के लिए षालेय वातावरण का स्वस्थ विद्यालय प्रषासन की होती है,परन्तु विद्यालय में कार्यरत् षिक्षकों का भी यह नैतिक दायित्व बनता है कि वे विद्यालय के वातावरण को बिगाड़ने दे, बल्कि ऐसा षैक्षिक वातावरण निर्मित करने में सहायक हो जिससे विद्यार्थियों की षैक्षिक अभिवृत्ति पर सकारात्मक प्रभाव पड़े ताकि वे एक प्रगतिषील समाज और राष्ट्र के जिम्मेदार नागरिक के रुप में स्थापित करने में स्वयं को समर्थवान बना सके।

 

संस्थागत वातावरण का अर्थ एवं परिभाषाएं -

षैक्षिक संस्थाओं की स्थापना का मुख्य ध्येय बालक का सर्वागींण विकास करना होता है। इसलिए विद्यालय प्रषासन का उद्देष्य भी इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु सक्रिय योग प्रदान करना होना चाहिए। विद्यालय संगठन को ऐसे संस्थागत वातावरण के निर्माण की ओर ईमानदारी के साथ कार्य करना चाहिए। बालक के व्यक्तित्व का संतुलित विकास करने की दृष्टि से षैक्षणिक संस्थाओं का ध्येय उनके षारीरिक, मानसिक, चारित्रिक एवं सामाजिक गुणों का विकास करते हुए उसकी षैक्षिक उपलब्धि को इस योग्य बनाना चाहिए जिससे कि वह भावी जीवन में अपने दायित्वों का निर्वाह सफलता एवं सच्चाई के साथ कर सके।

 

नेटजर एवं आईक के अनुसार -’’षैक्षणिक संस्था ने पर्यावरण के साथ अन्तः क्रिया करने वाले जटिल सामाजिक तकनीकी तंत्र है, जिनकी अनुकुल और निर्वाद क्रियाविधि दोनों विषेषताएं होती है।’’

 

केण्डल के अनुसार - ’’ षिक्षा प्रणालियां अपने संस्कृति पर्यावरण से प्रभावित होती है, केवल राष्ट्रीय प्रणालियां एक दूसरे से भिन्न होती है, बल्कि लोकतंत्र के अंतर्गत जहाँ विकेन्द्रीकरण को प्रोत्साहन प्राप्त है, स्थानीय प्रणालियां भी कई बातो में एक दूसरे से भिन्न होती है।

 

 

 

संस्थागत वातावरण के प्रकार.

1. उदार वातावरण

2. स्वायत्त वातावरण

3. नियंत्रण वातावरण

4. परिचित वातावरण

5. पैतृक वातावरण

6. संकुचित वातावरण

 

संस्थागत वातावरण को प्रभावित करने वाले कारक - निम्नांकित बाते संस्थागत वातावरण को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

1. विद्यालय का वातावरण

2. अध्यापक का व्यवहार व्यक्तित्व

3. अभिव्यक्ति के अवसर  

4. षिक्षा प्रणाली

5. पाठ्यक्रम

 

षैक्षिक उपलब्धि - बालक अपने जीवनकाल से अनेक प्रकार के ज्ञान तथा कौषल को कितनी दक्षता से उसने आत्मसात् किया उसका पता उसके ज्ञान कौषल के उपलब्धि परीक्षण से चलता है।

 

प्रेसी राबिन्स हाब्स -’’ उपलब्धि परीक्षाओं का निर्माण मुख्य रुप से छात्रों के सीखने के स्वरुप और सीमा का माप करने के लिए किया जाता है।’’

 

इबैल -’’उपलब्धि परीक्षण वह अभिकल्प है जो विद्यार्थी के द्वारा ग्रहण किये गये ज्ञान, कुषलता या क्षमता का मापन करता है।’’षैक्षिक उपलब्धि को अनुवांषिक वातावरणीय दोनों कारक प्रभावित करते है। बालक को अपन माता पिता या पूर्वजों द्वारा प्राप्त गुण योग्यताएं अनुवांषिक गुण कहलाते है पर जो गुण सूत्रों के द्वारा अगली पीढ़ी को हस्तांतरित होते रहते है।

 

अध्ययन का षैक्षिक महत्व -

षिक्षा का मुख्य उद्देष्य विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास करना है। वर्तमान परिवेष में बालकों की अध्ययन उपलब्धि में व्यापक परिवर्तन रहे है। विद्यार्थियों के उपलब्धि पर घर परिवार के वातावरण के साथ-साथ संस्थागत वातावरण का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। अतः विद्यालय प्रबंधन को इस बात की महत्ता को ध्यान में रखते हुए अपने विद्यालय में ऐसा वातावरण निर्मित करना चाहिए। जिससे वहाँ अध्ययनरत विद्यार्थियोें में अपने-अपने कर्तव्य दायित्व का निर्वहन कर सके। षैक्षिक अनुसंधान का षिक्षा प्रक्रिया में आवष्यक सुधार एवं विकास के लिए विषेष महत्व है। षिक्षा का मुख्य ध्येय जीवन में सुधार लाना तथा विद्यार्थियों का सर्वागीणं विकास करना है। वर्तमान समय में विद्यार्थियोें के संस्थागत वातावरण में व्यापक परिवर्तन हुआ। इन परिवर्तनों का अध्ययन तथा त्रुटियों के निवारण के द्वारा जागृत की जा सकेगी और संस्थागत वातावरण के माध्यम से विद्यार्थियो की षैक्षिक उपलब्धि में वृद्धि की जा सकेगी तथा प्रगति पथ की ओर अग्रसर होगा। छात्र और छात्राओं दोनों वर्गो को ऐसा आदर्ष संस्थागत वातावरण उन्हें उपलब्ध कराये जो उनकी षैक्षिक उपलब्धि में सकारात्मक प्रभाव डाल सके। अतः षैक्षिक उपलब्धि पर संस्थागत वातावरण के पड़ने वाले प्रभाव के संबंध के अध्ययन से जो निष्कर्ष प्राप्त होगा वह षिक्षा क्षेत्र के विकास में निष्चित रुप से लाभदायक सिद्ध होगा।

 

पूर्व में किये गये षोध अध्ययन:-

विषय की पूर्णता के लिए यह आवष्यक है कि षोघकर्ता समस्या से संबंधित विभिन्न क्षेत्रों का सुव्यवस्थित एवं सिद्धान्तपूर्ण तरीके से अवलोकन करे। इस हेतु संबंधित षोध साहित्य की जानकारी रखना आवष्यक है। ज्ञान के विस्तृत भंडार में उसका निरंतर योगदान प्रत्येक क्षेत्र में मानव द्वारा किये गये प्रयासों की सफलता से संभव बनाता है।

 

भारत में किए गये षोध अध्ययन:-

1. अग्रवाल एवं स्वर्णकार (2006) - ने सह शिक्षा एवं एकल विद्यालयों के शैक्षिक वातावरण का छात्रों के आत्मविश्वास पर प्रभाव का अध्ययन किया। अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य - सहशिक्षा एवं एकल विद्यालयों के शैक्षिक वातावरण की तुलना करना। सहशिक्षा विद्यालयों के शैक्षिक वातावरण का छात्रों के आत्मविश्वास पर सार्थक प्रभाव पड़ता है। एकल विद्यालयों के शैक्षिक वातावरण का छात्रों के आत्मविश्वास पर सार्थक प्रभाव पड़ता है ,थे।

 

2. जरीन (2001) ने परिषदीय एवं निजी प्राथमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों की गणित में निष्पत्ति एवं कक्षा वातावरण मंे सहसम्बन्ध का अध्ययन किया। इस अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य परिषदीय एवं निजी विद्यालयों के छात्रों द्वारा कक्षा में प्रत्यक्षीकृत कक्षा वातावरण की प्रमुख 14 विमाआंे तथा गणित की निश्पत्ति में सहसम्बन्ध ज्ञान करना। इस शोध कार्य से निम्न निष्कर्श प्राप्त हुये -1. परिषदीय निजी विद्यालयों के छात्रांे द्वारा अपनी कक्षाओं में प्रत्यक्षीकृत अधिगम समर्थक वातावरण की 12 में से 11 विमाओं में अन्तर होता है। 2. निजी परिषदीय विद्यालयों के छात्र अपनी कक्षा में पुरस्कार को समान मात्रा में प्रत्यक्षीकृत करते हैं।

 

3. सारस्वत, अनिल (1988) ने अलीगढ़ जिले के विभिन्न शैक्षिक वातावरण वाले किशोरों की उपलब्धि पे्ररणा, व्यावसायिक आकांक्षा एवं शैक्षिक निष्पत्ति का अध्ययन किया एवं निष्कर्ष निकाला कि महिला-पुरूष, शहरी-ग्रामीण, कला-विज्ञान, के विद्यार्थियों की व्यावसायिक आकांक्षाओं में सार्थक रूप से अन्तर पाया गया। उपलब्धि पे्ररणा, व्यावसायिक आकांक्षा एवं शैक्षिक निष्पत्ति के बीच धनात्मक एवं सार्थक सहसम्बन्ध था।

 

4. शर्मा (1972) ने संगठनात्मक वातावरण और विद्यार्थियों की उपलब्धियों के सन्दर्भ में अध्ययन किया और यह पाया कि संस्था के वातावरण का विद्यालयी सस्ंथागत कार्यो के मध्य सार्थक सम्बन्ध है। दूसरे अध्ययन में शर्मा (1972) ने पाया कि राजस्थान सरकार के अन्तर्गत कार्य करने वाले अध्यापक निजी विद्यालयों की तुलना में अधिक खुले वातावरण को प्रतीत करते हैं। उन्होंने एक और अध्ययन किया जिसका निष्कर्ष यह था कि प्रधानाचार्यों की प्रभावशीलता, अध्यापकों और उनकी सन्तुष्टि का सीधा सम्बन्ध विद्यालयी वातावरण से है।

 

5. रस्तोगी (1967) ने कक्षा वातावरण के सम्बन्ध में एक अध्ययन किया। रस्तोगी ने अपने अध्ययन में यह पता लगाने का प्रयास किया कि किस प्रकार का कक्षा वातावरण छात्रों को आन्तरिक रूप से प्रभावित करता है। न्यादर्श में कान्वेन्ट, सरकारी स्कूल, सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल, के स्कूलों को शामिल किया गया। कि किस प्रकार का वातावरण विद्यार्थियों को प्रभावित करता है।

 

6. कुमार (1972) ने विद्यालय के सामाजिक वातावरण ओैर विद्यार्थियांे के व्यवहार के सामाजिक वातावरण और विद्यार्थियों की विषेषताओं का अध्ययन किया उनके अध्ययन का उद्देष्य 6 प्रकार के विद्यालयों के सामाजिक वातावरण का विद्यार्थियों के व्यवहार उनके वैयक्तिक सामाजिक समायोजन के मूल्यों और शैक्षिक उद्देश्य के प्रति अभिवृत्ति और विद्यालयी उपलब्धि पर प्रभाव का अध्ययन करना था। अध्ययन का निष्कर्ष यह था कि विभिन्न सामाजिक वातावरण का विद्यार्थियों के व्यवहार पर अलग अलग प्रभाव पड़ता है।

 

7. प्रधान (1991)  ने उड़ीसा के माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों की सृजनात्मकता, समायोजन एवं शैक्षिक उपलब्धि पर विद्यालय के संगठनात्मक वातावरण के प्रभाव का अध्ययन किया इन्होने अपने अध्ययन में पाया कि विद्यालय के संगठनात्मक वातावरण का विद्यार्थियों की सृजनात्मकता गृह समायोजन एवं सामाजिक समायोजन पर प्रभाव नहीं पड़ता प्रधान का कार्य आपत्तिजनक है।

 

8. चैधरी (1997)  ने माध्यमिक स्तर पर कक्षा वातावरण का छात्रों के शैक्षिक अभिप्रेरणा पर प्रभाव का अध्ययन किया। इस षोध कार्य से निम्न निष्कर्ष प्राप्त हुये-कक्षा वातावरण छात्रों के शैक्षिक अभिप्रेरणा पर सार्थक प्रभाव डालता है। कक्षा वातावरण की कुछ विमाओं का षैक्षिक अभिप्रेरणा पर सार्थक प्रभाव पड़ता है, जिन विमाओं पर यह प्रभाव पडत़ा है वे हैं- एकता, प्रचलित नियम, लक्ष्य, निर्देशन, कठिनाई, प्रजातत्रिकता, प्रतिस्पर्धा, सृजनशीलता, प्रोत्साहन तथा अनुकूलन।

 

9. रत्नेष कुमार (2002) ने निजी एवं परिषदीय ग्रामीण प्राथमिक विद्यालयों के कक्षा वातावरण का तुलनात्मक अध्ययन किया। इस षोध मंे षोधकर्ता का उद्देष्य निजी एवं परिषदीय ग्रामीण प्राथमिक विद्यालयों के कक्षा वातावरण का तुलनात्मक अध्ययन करना था। षोधकर्ता ने अपने अध्ययन में निष्कर्ष निकाला कि दोनो प्रकार के विद्यालयों के कक्षा वातावरण में मूलभतू अन्तर होता है अर्थात कक्षा वातावरण की सभी चैदह विमाओं- पुरस्कार, सरलीकरण, आवेषन आदि में पर्याप्त सार्थक अन्तर होता है।

 

10.  ग्रोवर, एस (1979) ने अध्ययन में निष्कर्ष निकाला कि जो बालक अपने माता-पिता के अकेले बच्चे थे, उनका उनकी माता-पिता की आकांक्षाओ के मध्य सकारात्मक/धनात्मक सहसम्बन्ध पाया गया। उच्च आकांक्षा वाले माता-पिता की आकांक्षा स्तर का प्रभाव उनके बच्चों पर उच्च स्तर पर पाया गया एवं उनमें अपने माता पिता के गुण भी प्रभावी रूप में विद्यमान पाये गये। जबकि निम्न आकांक्षा स्तर वाले माता-पिता वाले जिनमंे पिता उच्च आकांक्षा एवं माता निम्न आकांक्षा स्तर की थी उनके बच्चों की विद्यालयी उपलब्धि में कोई सार्थक अन्तर नहीं पाया गया निम्न आकांक्षा वाले माता पिता वाले बालकों की विद्यालयी उपलब्धि मंे भी कोई सार्थक अन्तर नहीं पाया गया।

 

विदेषों में किये गये षोध अध्ययन:-

1ण् पेट्रीडेस, के. वी. एवं अन्य (2005) ने शैक्षिक व्यवहार और उपलब्धि में व्यक्तिगत विभिन्नता के संदर्भ में अध्ययन किया। निष्कर्ष पाया गया कि मौखिक योग्यता का शैक्षिक निष्पादन पर अधिक प्रभाव पाया गया। एकस्ट्रावर्सन और साइकोटिसिज्म, शैक्षिक निष्पादन से ऋणात्मक रूप से संबंधित थे, यद्यपि उनका प्रभाव कम था और लिंग के आधार पर संयमित था। शाब्दिक योग्यता, बहिर्मुखता, साइकोटिसिज्म निर्धारित करते है अनुपस्थिति, भगोड़ापन, अजीब व्यवहार शैक्षिक निष्पादन से ऋणात्मक रूप से संबंधित थे।

 

2ण् डानिजा, एम. इवानोविक एवं अन्य (2002) ने शैक्षिक उपलब्धि का विभिन्न चरों के साथ अध्ययन किया। यह एक क्रास सेक्शनल अध्ययन था। चिली मेट्रोपोलियन क्षेत्र के प्राथमिक और हाई स्कूल के 4509 विद्यालय जाने वाले विद्यार्थियों पर अध्ययन किया गया। निष्कर्ष स्वरूप पाया गया कि शैक्षिक उपलब्धि विभिन्न कारकों से प्रभावित होती है, बच्चों की विद्यालयी उम्र, उनका परिवार, शैक्षिक वयवस्था, पोषण, बौद्धिक क्षमता, सामाजिक संस्कृति बच्चों की शैक्षिक उपलब्धि को सार्थक रूप से प्रभावित करते है।

 

3ण् अल सईद (2000) ने यमनी महिलाओं की शैक्षिक उपलब्धि का वैयक्तिक अध्ययन विधि द्वारा अध्ययन किया। अध्ययन का उद्देश्य यमनी महिलाओं की शैक्षिक उपलब्धि में योगदान देने वाले कारकों का अध्ययन किया। अध्ययन में पाया गया कि स्त्रियों की शैक्षिक उपलब्धि पर उनके पारिवारिक सहयोग, अच्छे वातावरण तथा माता-पिता के सहयोग का प्रभाव पडता है।

 

4ण् पार्थर तथा गोडसे (1974) ने शैक्षिक मानसिक दृष्टि से समुन्नत नवयुवकों नवयुवतियों के समायोजन समस्या पर अध्ययन किया जिससे निष्कर्ष प्राप्त हुआ कि नवयुवक नवयुवतियों में से कुछ ने अपने लिए विशिष्ट कक्षाओं के समायोजन पर सहमति व्यक्त की, पर कुछ ने विशिष्ट कक्षाओं के बहिष्कार  पर बल दिया तथा सामान्य कक्षाओं में ही अपने समायोजन को उपयुक्त बताया। इससे यह पता चलता हेै कि शैक्षिक उपलब्धि के अतिरिक्त पारिवारिक पृष्ठभूमि भी समायोजन में सहायक होती है।

 

5ण् इमेट, डब्लू. जी. (1954) नेहाईस्कूल के विद्यार्थियों में सामाजिक समायोजन तथा प्राथमिक विद्यालयों में परीक्षणों के माध्यम से भविष्यवाणी करनाविषय पर एक अध्ययन किया और अध्ययन के परिणाम स्वरूप निष्कर्ष निकाला कि अच्छे अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों का समायोजन अच्छा होता है और शैक्षिक संप्राप्ति द्वारा समायोजन के बारे में अच्छे ढंग से भविष्यवाणी कर सकते हैं।

 

6ण् विलियम हैरीसन (1976) ने विश्वविद्यालय छात्रों के समायोजन पर अध्ययन किया, इन्होनें अपने अध्ययन में पाया कि एक ही पारिवारिक वातावरण के छात्रों के समायोजन पर विद्यालयीन वातावरण का कोई विशेष असर नहीं पड़ता है।

 

7ण् किन्टोसपाल (1977) नेपरिवार, विद्यालय, समाज एवं समुदाय को दृष्टि में रखते हुए छात्रों के समायोजन पर अध्ययन किया तथा निष्कर्ष में पाया कि जहां छात्रों का पारिवारिक समायोजन अच्छा रहता है वहां कक्षाओं में भी समायोजन की समस्या नहीं रहती है तथा छात्रों में उद्वेग, अनादर की भावना तथा प्रतिरोधात्मक रूप नहीं रहता है। अध्यापकों के भी विचार से पारिवारिक समायोजन तथा विद्यालयीय समायोजन में विषेष सम्बन्ध है। इन्होंने निष््रकष््र्रा निकाला था कि विद्यालयीय समायोजन के लिए पारिवारिक समायोजन आवष्यक है।

 

अध्ययन का उद्देष्य - प्रस्तुत लधु षोध में विद्यार्थियों की षैक्षिक उपलब्धि के सकारात्मक विकास को ध्यान में रखते हुए समस्या के अध्ययन संबंधी उद्देष्य निर्धारित किये गये है -

 

1. संस्थागत वातावरण का उनकी शैक्षिक उपलब्धि पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना।

2. छात्रों की षैक्षिक उपलब्धि एवं विद्यालय परिवेष पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना।

3. विद्यार्थियों की षैक्षिक उपलब्धि तथा षैक्षिक गतिविधि पर पड़ने वाले प्रभाव का तुलनात्मक अध्ययन करना।

 

प्रकार्यात्मक परिभाषा:-

परिभाषीकरण द्वारा समस्या का महत्व उपयोगिता स्पष्ट करना है, तथा सीमांकन करना है। वास्तिविक रुप में समस्या में प्रयुक्त षब्दों का उचित एवं स्पष्ट अर्थ आवष्यक है, क्योकि किसी षब्द का महत्व अर्थ संदर्भगत प्रयोग द्वारा निर्धारित होता है, समस्या षोध को दोषपूर्ण बनाती है। अतः यह आवष्कता है कि समस्या कथन में सरल उचित षब्दों का प्रयोग हो तथा समस्या के अर्थ को वे षब्द स्पष्ट करते हो। अतः प्रस्तुत षोध में समस्या कथन के अनुसार प्रयुक्त षब्दो ंमें स्वीकार्य अर्थ निम्नानुसार है-

उच्च माध्यमिक स्तर - सन् 1986 में प्रभावषील नवीन राष्ट्रीय षिक्षा नीति के अंतर्गत संपूर्ण भारत वर्ष (10$2$3) षिक्षा पद्धति क्रियाषील है। प्रस्तुत शोध अध्ययन में कक्षा 11 एवं 12 तक का विद्यालय उच्चतर माध्यमिक स्तर का कहा गया है।

षैक्षिक उपलब्धि:-किसी भी उपलब्धि के अंाकलन के लिये जो परीक्षण किया जाता है उसे उपलब्धि परीक्षण कहते है। षैक्षिक क्षेत्र की उपलब्धि के आंकलन के लिए तैयार परीक्षण को षैक्षिक परीक्षण कहते है। षैक्षिक उपलब्धि-परीक्षण किसी विशय अथवा पाठ्क्रम के विभिन्न विषयों में विघार्थियों के ज्ञान, समझ  तथा कुषलताओं का मापन करता है।

संस्थागत वातावरण:- किसी विद्यालय के संस्थागत वातावरण से अभिप्राय एक ऐसे वातावरण से होता है, जहाँ शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया स्वतः एवं स्वाभाविक होता है, जहाँ शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में आये अवरोधों को शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों के संयुक्त प्रयास से दूर किया जाता है, जहाँ छात्र सीखने की क्रिया में स्वयं उत्साह से भाग लेता है और अपने व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाने का प्रयास करता है।

 

अध्ययन की परिकल्पनाएं:- प्रस्तुत षोध के           षीर्षकउच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों के संस्थागत वातावरण का उनके षैक्षिक उपलब्धि पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययनसे संबंधित परिकल्पनाएं निम्नांकित है:-

1. षालेय वातावरण का षैक्षिक उपलब्धि पर धनात्मक प्रभाव पड़ेगा।

2. छात्रों की षैक्षिक उपलब्धि एवं विद्यालय परिवेष के मध्य धनात्मक संबंध पाया जायेगा।

3. विद्यार्थियों की षैक्षिक उपलब्धि तथा षैक्षिक गतिविधि के मध्य धनात्मक संबंध पाया जायेगा।

 

अध्ययन की परिसीमा:- प्रस्तुत लघु शोध में शोधकर्ती ने परिसीमा का निर्धारण इस प्रकार किया है:-

1. प्रस्तुत  शोध के लिए रायपुर जिले का चयन किया गया है।

2. प्रस्तुत शोध के लिए रायपुर जिले के अंतर्गत रायपुर तहसील का चयन किया गया है।

3. प्रस्तुत शोध के लिए रायपुर तहसील के अंतर्गत 05 विद्यालयों का चयन किया गया है।

4. प्रत्येक विद्यालय से 20 छात्र एवं 20 छात्राएं कुल 200 विद्यार्थियों चयन किया गया है।

 

समस्या का चर:-

स्वतंत्र चर:- उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों का संस्थागत वातावरण

परतंत्र चर:- विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि

षोध विधि:- प्रस्तुत शोध समस्या के अध्ययन हेतु शोधकर्ता द्वारा सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया है।

 

न्यादर्ष:-

प्रस्तुत षोध हेतु न्यादर्ष का चयन साधारण अनियमित न्यादर्ष विधि द्वारा किया गया है। साधारणत अनियमित न्यादर्ष के अंतर्गत जनसंख्या अथवा समुदाय के प्रत्येक व्यक्ति को न्यादर्ष के चयन के समान अवसर प्राप्त होता है, प्रस्तुत षोध प्रबंध में उच्चतर माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों की षैक्षिक उपलब्धि पर संस्थागत वातावरण के प्रभाव का अध्ययन किया गया है। इस उद्देष्य की पूर्ति हेतु उच्चतर माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों का चयन साधारण अनियमित न्यादर्ष विधि के अंतर्गत न्यादर्ष के रुप में किया गया है। इस विधि के अंतर्गत परिणाम में विष्वसनीयता तथा वैधता के प्राप्त होने की संभावना अधिक रहती है तथा मानक त्रुटियां कम रहती है। प्रस्तुत षोध प्रबंध में उच्चतर माध्यमिक स्तर के रायपुर जिले के 05 विद्यालयों में अध्ययनरत, प्रत्येक विद्यालय से 20 छात्र एवं 20 छात्राएं कुल 200 विद्यार्थियों का चयन न्यादर्ष के रुप में किया गया है।


 

सारणी क्रमांक - 1.1

न्यादर्ष के अंतर्गत विद्यालय का नाम एंव छात्र - छात्राओं की संख्या

Ø-

fo|ky; dk uke

Nk=

Nk=k

;ksx

1-

ia- fxfjtk 'kadj feJ 'kkl- mPprj ek/;fed fo|ky;] jk;iqjk

20

20

40

2-

fcUnk lksudj mPprj ek/;fed fo|ky;] jk;iqj

20

20

40

3-

ljLorh f’k’kq eafnj ljLorh fogkj] jk;iqj

20

20

40

4-

Ekk;kjke lqjtu 'kkl- mPprj ek/;fed fo|ky; pkScs dkWyksuh] jk;iqj

20

20

40

5-

'kkl- mPprj ek/;fed fo|ky; paxksjk HkkBk] jk;iqj

20

20

40

;ksx

100

100

200

 


उपकरण:- प्रस्तुत अध्ययन में आंकड़ों के संकलन के लिए संस्थागत वातावरण ज्ञात करने हेतु साक्षात्कार प्रष्नावली अनुसूची प्रयोग किया गया है। बच्चों के शैक्षिक समस्या के संदर्भ में सूक्ष्म अध्ययन हेतु साक्षात्कार और प्रत्यक्ष अवलोकन किया गया है। जिससे उनकी वास्तविक समस्या स्पश्ट रुप से शोधकर्ता के सामने सके।

 

सांख्यिकीय अभिप्रयोगः-

व्यवस्थापन हेतु आंकड़ों को सबसे पहले सारणीयन किया जाता है। सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग किया जाता है उसके पश्चात् सामग्री की विश्लेषण की व्याख्या की जाती है। उपकरण से प्राप्त प्राप्तांकों अथवा आँकड़ों को विभिन्न तालिकाओं में व्यवस्थित कर उनका विश्लेषण कर प्रतिषत निकाला गया है तथा दण्डआरेख द्वारा प्रदर्शित कर, व्याख्या की गई।

 

परिकल्पना का प्रमाणीकरण एवं परिणाम:- शोधकर्ता के द्वारा प्रस्तावित परिकल्पनाओं के सत्यापन हेतु परीक्षण का प्रषासन एवं मापन किया गया तथा सांख्यिकीय द्वारा निश्कर्श निकालने का प्रयास किया गया है।

 

1. परिकल्पना 1 . शालेय वातावरण का शैक्षिक उपलब्धि पर धनात्मक प्रभाव पड़ेगा।


 

 

तलिका क्रमांक 1.1

Øa-

dFku

gk¡ dk %

 Ukgha dk %

dqy izfr’kr

1-

D;k vkidk fo|ky; ,sls LFkku ij gSa tks Lkqoh/kktud gSa \

40

60

100

2-

D;k vkidk fo|ky; ,sls txg ij fLFkr gSA tgk¡W ;krk;kr cgqr de gSa \

50

50

100

3-

D;k vkidk fo|ky; ,sls txg fLFkr gSA tgk¡W 'kksj ugha gksrk gS \

60

40

100

4-

D;k vkids fo|ky; esa izR;sd d{kk ds fy, ,d dejk gSa \

90

10

100

5-

D;k vkidk fo|ky; 'kgj ds e/; esa fLFkr gSa \

0

100

100

6-

D;k vkids fo|ky; es Nk=kokl dh lqfo/kk gSa \

40

60

100

7-

D;k vkids fo|ky; esa [ksy dwn ds fy, izkax.k gS\

45

55

100

8-

D;k vkids fo|ky; esa [ksydwn izfrLi/kkZ gksrh gSa \

60

40

100

 

 


व्याख्या:-

उपरोक्त सारणी से स्पश्ट होता हैं कि 40 प्रतिषत विद्यालय सुविधा जनक स्थान पर हैं। 100 में से 50 प्रतिषत विद्यालय ऐसी जगह पर स्थित हैं जहाँॅ यातायात बहुत कम हैं 60 प्रतिषत विद्यालय ऐसी जगह पर स्थित है। जहाँॅ पर शोर नहीं होता हैं तथा 90 प्रतिषत स्कूलों में प्रत्येक कक्षा के लिए अलग अलग कमरा हैं। तथा  40 प्रतिषत विद्यालय में छात्रावास की सुविधा है। 45 प्रतिषत विद्यालय में खेल कूद के लिए प्रांगण है। 60 प्रतिषत विद्यालय में खेद कूद स्पर्धा होती है। कुल उत्तरदाताओं में से 48 प्रतिषत ने हाँॅ में उत्तर दिया। अतः शालेय वातावरण का शैक्षिक उपलब्धि पर धनात्मक संबंध पाया गया। अतः परिकल्पना स्वीकृत होती है।

 

परिकल्पना 2 . छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि एवं विद्यालय परिवेष के मध्य धनात्मक संबंध पाया जायेगा।

 

तलिका क्रमांक 1.2


Øa-

dFku

gk¡  dk%

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dqy izfr’kr

1-

D;k vkids fo|ky; esa fofHkUu 'kSf{kd dk;Zdzeksa ds fy, Ik;kZIr  LFkku gS \

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100

2-

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25

75

100

3-

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60

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100

4-

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100

5-

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100

6-

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65

35

100

7-

D;k vkidks vius fo'k; ls lacaf/kr vU; tkudkjh 'kkyk esa izkIr gksrh gSa \

60

40

100

8-

D;k vki orZeku 'kkyk O;oLFkk ls larq'V gS \

40

60

100

 


व्याख्या:-

उपरोक्त सारणी से स्पश्ट होता है कि 30 प्रतिषत विद्यालय में शैक्षिक कार्यक्रम के लिए पर्याप्त स्थान है। 100 मे से 25 प्रतिषत विद्यालय सहभागीय क्रियाओं में भाग लेने का पर्याप्त अवसर मिलता है, 60 प्रतिषत विद्यालय में अनुषासन ठीक है। अतः 55 प्रतिषत विद्यालय में नियमित समय पर आते है, तथा 45 प्रतिषत विद्यालय नियमित समय पर लगता है। तथा 65 प्रतिषत विद्यालय में षिक्षक प्रभावषाली ढंग से षिक्षण कार्य करते है। 60 प्रतिषत अपने विशय से संबंधित ढंग से षिक्षण कार्य करते है। 60 प्रतिषत अपने विशय से संबंधित अन्य जानकारी शाला मे प्राप्त होती है, 40 प्रतिषत शाला व्यवस्था से संतुश्ट है। कुल उत्तरदाताओं मे से 47.5 प्रतिषत ने हाॅ मे उत्तर दिया। अतः छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि एवं विद्यालय परिवेष के मध्य धनात्मक संबंध पाया गया। अतः परिकल्पना स्वीकृत होती है।

      

3.परिकल्पना 3 विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि तथा शैक्षिक गतिविधि के मध्य धनात्मक संबंध पाया जायेगा।


 

तलिका क्रमांक 1.3


Øa-

dFku

gk¡  dk

Ukgha dk

dqy izfr’kr

1

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100

2

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20

80

100

3

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30

70

100

4

D;k vkids fo|ky; ds ijh{kk Qy ls vfHkHkkod larq'V jgrs gSA

25

75

100

5

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35

65

100

6

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5

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100

7

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27

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100

8

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30

70

100


 

व्याख्या:-

1.        उपरोक्त सारणी से स्पश्ट होता है 30 प्रतिषत विद्यालय छात्र प्रतिनिधि के सुझावों पर ध्यान दिया जाता है। 20 प्रतिषत विद्यालय में अभिभावक समारोह के अवसर पर आते है। तथा 30 प्रतिषत प्रधानाचार्य चांज करने के बाद कार्यवाही करते है। 25 प्रतिषत विद्यालय परीक्षा फल से अभिभावक संतुश्ट रहते है। 35 विद्यालय में निर्धन छात्रों को आर्थिक सहायता दी जाती है। 5 प्रतिषत विद्यालय के पत्रिका में अधिकतर लेख छात्रों द्वारा लिखे जाते है। तथा 27 प्रतिषत विद्यालय कार्यालय से संबंधित कोई भी काम नियमित रूप से हो जाता है। 30 प्रतिषत छात्रों को सूचना समय पर मिल जाती है।  कुल उत्तरदाताओं में से 25.25 प्रतिषत ने हाॅ में उत्तर दिया। अतः विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि एवं शैक्षिक गतिविधि के मध्य धनात्मक संबंध पाया गया। अतः परिकल्पना स्वीकृत होती है।

2.         

3.        निश्कर्श:-

4.        1. परिकल्पना प्रथम के अनंसार स्पश्ट हैं कि 70 प्रतिषत विद्यालय सुविधा जनक स्थान पर है। 100 में से 75 प्रतिषत विद्यालय ऐसी जगह पर स्थित है जहाँ शोर नहीं होता है। तथा सभी स्कूलों में प्रत्येक कक्षा के लिए एक कमरा हैं और सभी विद्यालय शहर के मध्य में स्थित है। 75 प्रतिषत विद्यालय में छात्रावास की सुविधा उपलब्ध है। 85 प्रतिषत विद्यालय में खेलकूद के लिए प्रागंण है। सभी विद्यालयों में खेलकूद स्पर्धा होती है। कुल उत्तरदाताओं में से 72 प्रतिषत ने हाँ में उत्तर दिया। अतः शालेय वातावरण का शैक्षिक उपलब्धि पर धनात्मक प्रभाव पाया गया। अतः परिकल्पना स्वीकृत होती है।

5.         

6.        2. परिकल्पना द्वितीय के अनंसार स्पश्ट हैं कि 92 प्रतिषत विद्यालय में शैक्षिक कार्यक्रम के लिए पर्याप्त स्थान है। 100 में से 88 प्रतिषत विद्यालय में सहभागी क्रियाओं में भाग लेने का पर्याप्त अवसर मिलता है। 80 प्रतिषत विद्यालय में अनुषासन ठीक है, तथा 99 प्रतिषत षिक्षक विद्यालय में नियमित समय पर आते है। तथा 96 प्रतिषत विद्यालय नियमित समय पर लगता है। तथा 99 प्रतिषत षिक्षक प्रभावषाली ढंग से षिक्षण कार्य करते है। तथा 82 प्रतिषत  विद्यालय में अपने विशय से संबंधित अन्य जानकारी शाला में प्राप्त होती है। तथा 88 प्रतिषत विद्यार्थी शाला व्यवस्था से संतुश्ट है। कुल उत्तरदाताओं में से 90.5 प्रतिषत ने हाँ में उत्त्र दिया। अतः छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि एवं विद्यालय परिवेष के मध्य धनात्मक संबंध पाया गया। अतः परिकल्पना स्वीकृत होती है।

7.         

8.        3. परिकल्पना तृतीय के अनुसारस्पश्ट होता है कि 45 प्रतिषत विद्यालय छात्र प्रतिनिधि के सुझावों पर घ्यान दिया जाता हैं 65 प्रतिषत विद्यालय में अभिभावक समारोह के अवसर पर आते है तथा 80 प्रतिषत छात्रों की षिकायत पर प्राधानाचार्य जांॅच करने के बाद कार्यवाही करते है। 95 प्रतिषत विद्यालय परिक्षाफल से अभिभावक संतुश्ट रहते है। 90 प्रतिषत विद्यालय के पत्रिका में अधिकतर लेख छात्रों द्वारा लिखे जाते है तथा 75 प्रतिषत विद्यालय कार्यालय से संबंधित कोई भी काम नियमित रूप से हो जाता है। 100 प्रतिषत छात्रों को सूचना समय पर मिल जाती है। कुल उत्तरदाताओं में से 90 प्रतिषत ने हाँॅ में उत्त्र दिया विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि एवं विद्यालयीन गतिविधि के मध्य धनात्मक संबंध पाया गया। अतः परिकल्पना स्वीकृत होती है।

9.         

10.     संदर्भित ग्रंथ सूची:-

11.     1ण् आर. . शर्मा - षिक्षा अनुसंधान,आर लाल बुक डिपो, मेरठ 2007

12.     2ण् पाठक पी.डी. - षिक्षा, मनोविज्ञान, विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा,2007

13.     3ण् डांॅ. रामपाल सिंह- शैक्षिक अनुसंधान एवं सांख्यिकी, अग्रवाल पब्लिकेषन, आगरा -7,2008

14.     4ण् कपिल डांॅ. एच.के. (2007) - अनुसंधान विधियांॅ,एच. पी. भार्गव बुक हाउस आगरा

15.     5ण् अस्थाना बिपिन - मनोविज्ञान और षिक्षा में मापन एवं मूल्यांकन विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा,2 पृ.क्र. 390-402

16.     6ण् भार्गव महेष (1982)- आधुनिक मनोवैज्ञानिक परीक्षण एवं मापन, पृ.क्र. 245-267

17.     7ण् भटनागर सुरेष (2000)- षिक्षा मनोविज्ञान, आर लाल बुक डिपो मेरठ103, मोतीबाजार

18.     8ण् स्वरूप सक्सेना (2006)- उदीयमान भारतीय समाज में षिक्षक, आर लाल एन.आर. चतुर्वेदी षिक्षा बुक डिपो निकट गर्वमेंटइंटर कालेज मेरठ 250001

19.     9ण् त्यागी एवं पाठक (2000)- षिक्षा के सामान्य सिद्वांत, विनोद पुस्तक मंदिर आगरा -21

20.     10ण्     वर्मा प्रीति एवं श्रीवास्तव (2005) - आधुनिक सामान्य मनोविज्ञान

21.     11ण्     मल्होत्रा आर.एन. - शैक्षिक अनुसंधान के मूल तत्व, विनोद पुस्तक मंदिर आगरा

22.     12ण्     सुखिया एस.पी. - स्कूल प्रषासन संगठन, विनोद पुस्तक मंदिर

23.     13ण्     सरीन एवं सरीन - शैक्षिक अनुसंधान विधियांॅ, अग्रवाल पब्लिकेषन्स आगरा

 

 

 

 

 

Received on 25.04.2020         Modified on 12.05.2020

Accepted on 07.06.2020         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2020; 8(3):69-77.